बहुत से लोगों की ख़्वा’हिश होती है कि वो अपनी ज़िंदगी में कम से कम एक बार तो बड़े परदे पर नज़र आएँ। यहाँ तक कि TV पर आते ही लोग अपने परिवार और रिश्तेदारों को बताने लगते हैं कि उन्हें देखें लेकिन अगर हम आपको कहें कि बॉलीवुड में एक ऐक्ट्रेस ऐसी भी हुईं जिन्होंने क़रीब 600 फ़िल्मों में काम किया लेकिन देखी एक भी नहीं तो आप विश्वास करेंगे। अब आप विश्वास करें या नहीं लेकिन बता तो ये सच्ची है। जी हाँ जिस अदाकारा के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं उनकी ज़िंदगी से जुड़े कई ऐसे पहलू हैं जो आपको बहुत अच्छे लगेंगे।

आज हम बात कर रहे हैं शो’ले फ़िल्म में बसंती की मौसी का किर’दार नि’भाने वाली ऐक्ट्रेस लीला मिश्रा की। जी हाँ, वही लीला मिश्रा जो आवारा, दाग़, प्यासा, परिचय, अमर प्रेम, बातों- बातों में जैसी कई फ़िल्मों में अपने किरदार से लोगों को मोह चुकी हैं। दरअसल लीला मिश्रा के पति राम प्रसाद मिश्रा एक कैरेक्टर आर्टिस्ट थे और जब लीला मिश्रा उनके पास आयीं तो जल्द ही दादा साहेब फाल्के के नाशिक सिनेटोन में दोनों को कलाकार के तौर पर नौकरी पर रख लिया गया। जहाँ पति की सेलरी 150 रुपए महीने थी तो लीला मिश्रा को 500 रुपए प्रति महीने की सेलरी पर रखा गया।
Leela Mishra

लेकिन पहली ही फ़िल्म में, जहाँ पति- पत्नी को शिव पार्वती का किरदा’र मिला और दोनों कुछ कह नहीं पाए और नौकरी हाथ से गयी। अपनी दूसरी फ़िल्म में भी वो कोई डायलॉग नहीं बोल पायीं और जब अगली फ़िल्म में उन्हें हीरोईन का रोल मिला तो उन्होंने हीरो के गले में हाथ डा’लकर उसके साथ प्रेम भरे डायलॉग बोलने से मना कर दिया क्योंकि वो शादीशुदा थीं और अपने पति के सि’वा किसी के साथ इस तरह से बात करना उन्हें सही नहीं लगता था। फिर क्या था 18 साल की लीला मिश्रा हीरो की प्रेमिका बनने की बजाए उनकी माँ बन गयी और उस फ़िल्म से जो सिलसि’ला शुरू हुआ वो जारी रहा।

लीला मिश्रा की खड़ी बोली और उनके बोलने का देसी अन्दा’ज़ लोगों को ख़ूब भाता। माँ का किरदार उन्होंने इतना निभाया कि वो लोगों के मन में बस गयीं अब भला शोले की मौसीजी को कौन भूल सकता है? शतरंज के खिलाड़ी में भी उनकी भूमिका को काफ़ी पहचान मिली। क़रीब 600 फ़िल्मों में भूमिका करने के बाद भी लीला मिश्रा ने कभी अपनी कोई फ़िल्म नहीं देखी। इसके पीछे उनका कार’ण भी बिलकुल अ’लग है। लीला मिश्रा से जब किसी ने पूछा कि उन्होंने कभी अपनी कोई भी फ़िल्म क्यों नहीं देखी? तो उनका जवाब था कि फ़िल्म देखने के लिए कैब, टिकट पर पैसे और समय ख़’र्च करके अजीब सी सीट में बैठकर इतनी देर फ़िल्म देखने से अच्छा है कि अपने घर में बैठकर कोई किताब पढ़ ली जाए, कुछ अच्छा खा लिया जाए और पड़ोसियों के साथ बातें कर ली जाए।

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लीला मिश्रा ने अपने एक इंटरव्यू में कहा कि उन्हें पता भी तो है कि सिर्फ़ तीन सीन में ही वो हैं तो ऐसे में इतनी मेहनत क्यों करना है। लीला मिश्रा बताती हैं कि उन्हें तो हीरो हीरोईन की पहचान भी नहीं है। फ़िल्म दु’श्मन की शू’ट के दौरान वो कुर्सी पर बैठीं हीरो राजेश खन्ना को को’स रही थीं कि वो इतनी देर से आता है कि शू’ट ही अ’टकी है जबकि राजेश खन्ना उनकी बग़ल वाली कुर्सी में ही बैठे थे। बाद में राजेश खन्ना ने उन्हें हँसते हुए बताया कि वो ही फ़िल्म के हीरो हैं और वो से’ट पर ही हैं।

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