1950 और 60 के दशक को भारतीय सिनेमा का सुनहरा दौर माना जाता है. आज़ादी के बाद हिन्दी फ़िल्मों में जो नया रंग आया था उसमें संकृति, साहित्य, संगीत और कहानी पर बड़ा ज़ोर था. इस दौर में एक से बढ़कर एक फ़िल्मों का निर्माण हुआ. मदर इंडिया, मुग़ल ए आज़म, देवदास और प्यासा जैसी कई शानदार फ़िल्मों ने हिन्दी सिनेमा को भारत ही नहीं बल्कि वैश्विक पटल पर ला दिया.

इस दौर में बिमल रॉय, महबूब ख़ान, गुरु दत्त, और के आसिफ़ जैसे निर्देशकों ने कई बेहतरीन फ़िल्में ऑडियंस के सामने पेश कीं तो नर्गिस, नूतन, मीना कुमारी और मधुबाला जैसी अभिनेत्रियों ने शोहरत की बुलंदियाँ हासिल कीं. अगर अभिनेताओं की बात करें तो ये दौर दिलीप कुमार, देव आनंद और राज कपूर की तिकड़ी का था.

आज के विडियो में हम बात इन्हीं तीन सितारों के स्टारडम की करने जा रहे हैं. 40 के दशक के अंत होते होते ये तीनों अभिनेता सिने पर्दे पर दस्तक दे चुके थे। अपने जुदा अंदाज़ की वजह से तीनों ही की बड़ी फ़ैन फ़ॉलोइंग बन गई। देव आनंद ने क्राइम थ्रिलर बाज़ी और सीआईडी जैसी फ़िल्मों से ख़ुद को स्थापित किया तो वहीं उनके चार्मिंग लुक ने उनको रोमांटिक हीरो के बतौर भी कामयाबी दिलाई।

सन 1965 में आयी फ़िल्म गाइड ने उनके कामयाब करीयर में चार चाँद लगा दिए। देव आनंद को फ़िल्म काला पानी और गाइड के लिए फ़िल्मफ़ेयर पुरुस्कार से भी नवाज़ा गया। गाइड को भारतीय सिनेमा में मील का पत्थर माना जाता है. राज कपूर की बात करें तो उन्होंने बरसात जैसी कामयाब फ़िल्म से अपने आपको स्थापित कर लिया था। आवारा से उन्हें और कामयाबी मिली तो बेवफ़ा से उन्हें क्रिटिक्स की भारी वाहवाही मिली। फिर सुबह होगी, अनाड़ी, दिल ही तो है, संगम जैसी शानदार फ़िल्मों में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया.

अनाड़ी और जिस देश में गंगा बहती है के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्मफ़ेयर पुरूस्कार भी मिला. राज एक मंझे हुए अभिनेता तो थे ही, साथ ही वो कामयाब निर्देशक भी माने जाते हैं. 50 और 60 के दशक में ही उन्होंने बतौर निर्देशक आवारा, श्री ४२० और संगम जैसी फ़िल्में दीं. बतौर निर्माता-निर्देशक भी उन्हें कई बड़े पुरूस्कार हासिल हुए.

इस तिकड़ी का तीसरा नाम है दिलीप कुमार. ऐसा माना जाता है कि भारत में मेथड एक्टिंग की नीव दिलीप कुमार ने ही रखी. सन 1944 में फिल्म ज्वार भाटा से अभिनय की दुनिया में क़दम रखने वाले दिलीप कुमार को 50 के दशक में बाबुल से बड़ी कामयाबी हासिल हुई. दीदार और देवदास जैसी फ़िल्मों ने दिलीप कुमार को ट्रेजेडी किंग का ख़िताब दिलवाया तो ‘राम और श्याम’ जैसी फ़िल्मों में उनकी कॉमिक टाइमिंग ने तारीफ़ पाई. उन्होंने भारतीय सिनेमा की सबसे शानदार फ़िल्मों में से एक मुग़ल ए आज़म में शहज़ादा सलीम की भूमिका निभाई. दिलीप कुमार को कुल 8 बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्मफ़ेयर पुरूस्कार मिला है जिसमें से 7 अवार्ड उन्हें इसी दौर में मिले हैं. सन 83 में फ़िल्म शक्ति के लिए भी उन्हें ये पुरूस्कार मिला था. दिलीप कुमार को पहला फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड जीतने का भी गौरव प्राप्त हुआ. 1954 में जब पुरूस्कार शुरू हुए तो उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ख़िताब मिला.

इस तिकड़ी की पॉपुलैरिटी का ये आलम था कि 1954 से लेकर 1962 तक सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए कुल 21 नोमिनेशन हुए, इन 21 में से 19 नामांकन इन्हीं तीनों के नाम थे. 1955 में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता भरत भूषण चुने गए जबकि अगले साल उन्हें एक नामांकन मिला. इसके अतिरिक्त इन सालों में सिर्फ़ दिलीप कुमार, देव आनंद और राज कपूर का ही नाम रहा. सन 1959, 1960, 1961, 1962 में हर साल तीनों अभिनेताओं को फ़िल्मफेयर में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का नामांकन मिला. सन 1959 में देव आनंद, 1960 और 61 में राज कपूर तो 1962 में दिलीप कुमार ने अवार्ड जीता. दिलीप कुमार को 1954, 56, 57 और 58 में भी सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरूस्कार मिला. बाद में दिलीप कुमार को लीडर और राम और श्याम के लिए भी ये अहम् पुरूस्कार मिला. देव आनंद को 1959 में काला पानी और 1967 में गाइड के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का अवार्ड मिला जबकि राज कपूर को 1960 में अनाड़ी और 1962 में जिस देश में गँगा बहती है के लिए ये अवार्ड हासिल हुआ.

60 के दशक के अंत होते-होते इन सितारों की पॉपुलैरिटी कम होने लगी. दिलीप कुमार और राज कपूर की बड़ी फ़िल्में पिटने लगीं जबकि देव आनंद को कुछ कामयाबी मिलती रही. इसके पीछे बड़ा कारण इन सितारों की उम्र का बढ़ना भी रहा और एक कारण सिनेमा का बदलता रूप भी. इस बदलाव के साथ कुछ हद तक देव आनंद ने अपने आपको ढाला और उनको कामयाबी भी मिली लेकिन जैसा स्टारडम उनका 60 के दशक में था, वैसा न मिल सका. देव आनंद ने 70 के दशक में गैम्बलर, और देस परदेस जैसी फ़िल्मों में अभिनय किया. वो अपने जीवन के आख़िरी समय तक फ़िल्म-निर्माण में व्यस्त रहे.

राज कपूर ने बाद के दौर में फिल्म निर्माण पर अपना ध्यान केन्द्रित किया. हालाँकि वो अभिनय भी करते रहे लेकिन उन्हें इस दौर में अपने निर्देशन की वजह से ख्याति मिली. बतौर निर्देशक उन्होंने मेरा नाम जोकर, बॉबी, सत्यम शिवम् सुन्दरम और प्रेम रोग जैसी फ़िल्मों का निर्देशन किया. प्रेम रोग और राम तेरी गँगा मैली के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरूस्कार भी मिला.

दिलीप कुमार ने सगीना और बैराग के फ्लॉप होने के बाद फ़िल्मों से ब्रेक लिया. पाँच साल के ब्रेक के बाद उन्होंने 1981 में क्रांति फ़िल्म से बतौर करैक्टर आर्टिस्ट वापसी की. 80 के दशक में दिलीप कुमार ने शक्ति और मशाल जैसी फ़िल्मों में अपने अभिनय का लोहा मनवाया. 1983 में उन्हें फिल्म शक्ति के लिए एक बार फिर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरूस्कार मिला जबकि 1985 में मशाल और 1992 में सौदागर के लिए उन्हें नामांकन हासिल हुआ.

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