मुम्बई: एक दौर था जब बॉलीवुड में इस तरह के कलाकार काम करते थे जो उसूलों के एकदम पक्के थे. जो उन्हें अच्छा नहीं लगता था वो सामने ही कह देते थे लेकिन ऐसा भी नहीं था कि वो किसी को ज़लील करें. अपने साथी कलाकार के लिए सम्मान की भावना पहले जितनी देखने को मिलती थी अब तो शायद ही मिलती हो. उस दौर के बड़े मशहूर कलाकार थे प्राण. प्राण की बॉलीवुड इंडस्ट्री में बहुत इज़्ज़त थी.

इसकी वजाह ये थी कि वो बहुत विनम्र स्वभाव के थे और वो अच्छे अदाकार के साथ साथ अच्छे इंसान भी थे. कुछ इसी तरह का एक क़िस्सा हम आज बताने जा रहे हैं. साल 1973 था और फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड का फंक्शन चल रहा था. सभी को ये उम्मीद थी कि फ़िल्म पाकीज़ा के लिए मरहूम संगीतकार ग़ुलाम मुहम्मद को अवार्ड दिया जाएगा. इसकी वजह ये थी कि पाकीज़ा के गाने गीत-संगीत की कसौटी पर खरा सोना थे.

परन्तु जब अवार्ड की घोषणा हुई तो लोग हैरान रह गए क्यूँकि अवार्ड मिल गया ‘बेईमान’ के लिए संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन को. ये बात प्राण साहब को बिलकुल पसंद न आयी और जब उनको ‘बेईमान’ के लिए ही सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का ख़िताब दिया जाने लगा तो उन्होंने वो अवार्ड लेने से इनकार कर दिया. उन्होंने पाकीज़ा फ़िल्म के संगीत का सम्मान न करने को लेकर जूरी की आलोचना की. बहुत से जानकार इसके पीछे ये वजह मानते हैं कि ‘बेईमान’ दिसम्बर, 1972 में रिलीज़ हुई थी और इस वजह से उसके गाने रेडियो पर लगातार बज रहे थे जबकि पाकीज़ा फ़रवरी 1972 में आयी थी.

अब वजह जो भी रही हो लेकिन ‘बेईमान’ के लिए शंकर-जयकिशन को पुरूस्कार मिल गया. ये भी एक सच है कि ‘बेईमान’ फ़िल्म के गाने आज के दौर में कम ही पॉपुलर रह गए हैं वहीँ पाकीज़ा के गाने आज भी क्लासिक की श्रेणी में रखे जाते हैं. प्राण साहब इस बात को अच्छी तरह से जानते थे और चाहते थे कि अच्छे संगीत का सम्मान हो.