आज सवेरे जब लोगों को ये ख़बर मिली कि उनके चहेते सितारे दिलीप कुमार साहब नहीं रहे तो उनके फैन्स में शोक की लहर दौड़ गई. 98 साल के दिलीप कुमार को फिल्म जगत का सबसे आला दर्जे का सितारा माना जाता है. उनके बारे में निर्देशक सत्यजीत रे ने कहा था कि दिलीप साहब से बड़ा मेथड एक्टर कोई भी नहीं है. दिलीप कुमार का निध’न फ़िल्म जगत के लिए ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती.

1922 में जन्मे दिलीप कुमार ने आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद का दौर देखा. पेशावर से ताल्लुक़ रखने वाले दिलीप कुमार का असली नाम युसुफ़ ख़ान है और बँटवारे के बाद वो भारत में ही रुके जबकि उनके कई रिश्तेदार पाकिस्तान में भी हैं. दिलीप साहब ने अपनी अभिनय क्षमता से भारत ही नहीं पूरी दुनिया में नाम कमाया. उनकी शोहरत का आलम ये था कि बॉलीवुड तो क्या हॉलीवुड तक के निर्देशक उनको अपनी फिल्म में लेने के लिए परेशान रहते थे.

दिलीप कुमार मूक फ़िल्मों की कामयाब अभिनेत्री देविका रानी की खोज थे. 1944 में फ़िल्म ज्वार भाटा से उन्होंने फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखा. 1946 में आयी जुगनू से उन्हें बड़ी कामयाबी हासिल हुई. उन्होंने दाग़, देवदास, आज़ाद, नया दौर, यहूदी, मधुमति, पैग़ाम, मुग़ल ए आज़म, राम और श्याम, क्रांति, शक्ति, मशाल जैसी अनेकों कामयाब फ़िल्मों में काम किया. उनकी अदाकारी की बेतहाशा तारीफ़ें हुईं. उन्होंने कर्मा और सौदागर जैसी फ़िल्मों में शानदार अभिनय किया.

दिलीप कुमार ने भारतीय सिने जगत को भोजपुरी से भी रू-ब-रू कराया. फ़िल्म ‘गंगा जमुना’ में भोजपुरी बोली का अत्यधिक प्रयोग किया गया. इस फ़िल्म के दो साल बाद ही भोजपुरी सिनेमा की पहली फ़िल्म ‘ए गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो’ का निर्माण हुआ. बॉलीवुड के सबसे सुनहरे दौर में दिलीप साहब की कामयाबी का ये आलम था कि एक बेहद बड़े बजट की हॉलीवुड फिल्म ‘लॉरेंस ऑफ़ अरेबिया’ में उन्हें अहम् किरदार ऑफर किया गया. दिलीप कुमार ने इस फ़िल्म में काम करने से इनकार कर दिया.

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