देव साहब और दिलीप साहब ने साथ में की बस ये फ़िल्म लेकिन प्रोडूसर ने किसी और को बना दिया ‘हीरो’..

फ़िल्मी दुनिया के इतिहास पर नज़र डालें तो देव आनंद और दिलीप कुमार दो ऐसे सितारे हैं जिनकी जितनी तारीफ़ की जाए कम है. दिलीप साहब और देव साहब एक समय फ़िल्मी दुनिया पर राज करते थे. ये वह समय था जब दिलीप कुमार, देव आनंद और राज कपूर सबसे बड़े स्टार थे और इनके आगे कोई नहीं था. प्रोडूसर कोशिशों में रहते थे कि ये तीनों या इनमें से दो साथ में काम कर लें.

हालाँकि ये भी सच है कि दो बड़े स्टार्स को साथ लाना प्रोडूसर की जेब पर भारी पड़ जाता है. यही वजह है कि हम अपने चहेते सितारों को बहुत कम ही किसी फ़िल्म में देख पाते हैं. अच्छा छोड़िए ये क़िस्सा, अब हम आते हैं उस बात पर जो हम करना चाहते हैं. असल में देव आनंद और दिलीप कुमार ने साथ में बस एक ही फ़िल्म की है और उसका नाम है ‘इंसानियत’. इस फ़िल्म में इन दो महानायकों के साथ बीना रॉय थीं. 1955 में रिलीज़ हुई ये फ़िल्म अपने आप में एक अलग तरह की फ़िल्म थी.

इस फ़िल्म से न तो देव आनंद को फ़ायदा हुआ और न ही दिलीप कुमार को, बल्कि दोनों तो इस फ़िल्म का नाम भी सुनना पसंद नहीं करते थे. ऐसा भी नहीं कि फ़िल्म हिट नहीं थी, फ़िल्म ने बॉक्स ऑफिस पर कमाल कर दिया था लेकिन इसमें वजह न फ़िल्म की स्टोरी थी, न ही इन दोनों सितारों की एक्टिंग और न ही फ़िल्म का संगीत.

असल में फ़िल्म की सारी कामयाबी का श्रेय एक चिंपांज़ी को गई. उस समय के बड़े प्रोडूसर एसएस वासन जो ख़ुद ही जैमिनी स्टूडियो चलाते थे, वह अक्सर फ़िल्म के बीच में कुछ नया बदलाव करने के लिए जाने जाते थे. वासन के पास पैसे की कोई कमी नहीं थी और वह अपनी फिल्मों की शूटिंग मद्रास (चेन्नई) स्थित अपने स्टूडियो में कराते थे.

इस फ़िल्म को जब बनाने की तैयारी हो गई तो दिलीप साहब और देव साहब दोनों को मद्रास बुलाया गया लेकिन फ़िल्म की शूटिंग के बीच ही वासन साहब को लगा कि मामला कुछ ठीक नहीं बन रहा. वह अपने क्रिएटिव डिपार्टमेंट के लोगों से बात करने लगे. वासन ख़ुद ही फ़िल्म का निर्देशन भी कर रहे थे और वह इस तरह से फ़िल्म के बीच में बदलाव 1948 में रिलीज़ हुई चंद्रलेखा में कर चुके थे.

चंद्रलेखा के समय उन्होंने फ़िल्म आधी शूट हो जाने के बाद उसमें सर्कस का सेट अप स्टोरीलाइन में डाल दिया. ‘इंसानियत’ की शूटिंग के दौरान जब उन्होंने अपनी टीम से बात की तो उसमें से किसी ने कहा-“कहानी अच्छी हो सकती थी अगर इसमें बंदर भी होता तो..” वासन साहब के सोचने का तरीक़ा अलग था. उन्होंने इस कमेंट को यक़ीनी बनाने के लिए सोचना शुरू कर दिया.

उन्होंने तय किया कि वह इस फ़िल्म में चिंपांज़ी को लेकर आएँगे. वासन ने ज़िप्पी, द चिम्प के बारे में सुना हुआ था. उन्होंने सुना था कि ये चिंपांज़ी पियानो बजा सकता और टाइपराइटिंग भी जानता है. ज़िप्पी की अमरीकी टीवी शो और नाईट क्लब्स में उपस्थिति होती थी और वह 55 हज़ार डॉलर हर महीने कमाता था. वासन साहब ने तमाम कोशिशें कीं और जिसका नतीजा ये हुआ कि चिंपांज़ी एक महीने के अन्दर ही मद्रास आ गया.

मद्रास के मीनामबक्कम एअरपोर्ट पर चिम्प का भव्य स्वागत हुआ. मीडिया ने भी इसको ख़ूब छापा. वासन इस सब से बेहद ख़ुश थे लेकिन वासन को एक बात का झटका ज़रूर लगा. उन्हें इस बात का झटका लगा कि ज़िप्पी की हाइट काफ़ी कम थी. वह केवल 18 इंच का था. वासन ने अपनी टेक्निकल टीम से इस कमज़ोरी को छुपाने के लिए कहा और कैमरा एंगल को उसी तरह से व्यवस्थित किया गया कि चिम्प की हाइट कम न लगे.

एक समय संजीदा क़िस्म की स्टोरी के साथ शुरू हुई फ़िल्म इंसानियत कॉमेडी में बदल गई. ज़िप्पी पर दो गाने भी फ़िल्माए गए जिसमें उनके साथ कॉमेडियन आग़ा भी थे. देव आनंद और दिलीप कुमार को वासन का रवैया बिल्कुल पसंद नहीं आया. एक तरफ़ फ़िल्म की शूटिंग के दौरान ही ज़िप्पी के साथ फोटो खिंचवाने वाले अमीर लोगों की लाइन लगती थी वहीं दो बड़े अभिनेता इसे अजीब पा रहे थे.

फ़िल्म के रिलीज़ होने पर न तो इसकी स्टोरी की चर्चा हुई और न ही देव आनंद, दिलीप कुमार और बीना रॉय की. फ़िल्म ज़बरदस्त हिट हुई और उसकी वजह सिर्फ़ और सिर्फ़ ज़िप्पी ही था. देव आनंद ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि वह एक ऐसा अनुभव है जिसे मैं भूल जाना चाहता हूँ.

चुग़ली बाज़

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