फ़िल्म इंडस्ट्री में जब से मी’ टू आया तो फ़िल्म इंडस्ट्री की सारी असलि’यत सामने आयी। वैसे इससे पहले भी फ़िल्म इंडस्ट्री में ऐसा होता रहा है चाहे वो सीनियर ऐक्टर का न्यू कमर का फ़ा’यदा उ’ठाना रहा हो या निर्माता- निर्देशक का ल’ड़कियों के साथ ग़ल’त व्यव’हार करना। आज हम आपको ऐसी ही एक चर्चित क़ि’स्से के बारे में बताने जा रहे हैं जो बॉलीवुड की एक बे’हद चर्चि’त हस्ती के साथ हुआ था। जिसके बारे में उन्होंने खु’लकर भी बताया। जी हाँ, हम बता कर रहे है चर्चित कोरियोग्राफ़र सरोज ख़ा’न की। वैसे तो सरोज ख़ा’न ने मी’ टू के मु’द्दे पर फ़िल्म इंस्ट्री का पक्ष लिया था और ये कहा था कि हर जगह ल’ड़कियों के साथ ऐसा होता है, ये लड़कियों पर निर्भर करता है। क’म से क’म फ़िल्म इंडस्ट्री उन्हें काम तो देती है।

ये बात उस समय की है जब सरोज ख़ा’न इस इंडस्ट्री में आयी थी। दरअसल सरोज ख़ा’न के पिता किशनचंद सद्धु सिंह बँ’टवारे के समय पा’किस्तान से भारत आए थे और वहाँ काफ़ी अमीर होने के कारण उन्हें काम करने की। कोई आदत नहीं थी। ऐसे में यहाँ उनके घर में खा’ने के ला’ले प’ड़ गए ऐसे समय में ही जन्म हुआ सरोज ख़ा’न का जिनका नाम था निर्मला। छोटी उम्र से ही उन्हें डान्स करने का शौक़ था वो अपनी परछाइयाँ देखकर नाचा करती थीं। आख़िर माता-पिता ने उन्हें फ़िल्म इंडस्ट्री में डाल दिया लेकिन नाम ख़’राब न हो ये सोचकर उन्होंने निर्मला की जगह उनका नाम सरोज कर दिया। सरोज ख़ा’न बाल कलाकार के रूप में काम करने लगीं।

बाल कलाकार से काम करते हुए सरोज ख़ान जूनियर आर्टिस्ट और फिर बैकग्राउंड डान्सर बन गयीं। यहीं एक फ़िल्म की शूट के दौरान जब सरोज हेलेन के पीछे डान्स कर रही थीं तो पूरी तरह हेलन की स्पीड मैच कर रही थी जहाँ फ़िल्म के डान्स डायरेक्टर सोहनलाल की नज़र उन पर प’ड़ी और उन्होंने सरोज को बुलाकर अपने ग्रूप में शामिल कर लिया। अब सरोज सोहनलाल के साथ रोज़ाना डान्स सीखने लगी। वो सरोज की क़ाबिलियत देखकर उसे कठिन से कठिन स्टेप्स दिया करते। तीन- तीन घंटे एक ही मुद्रा में खड़ा कर दिया करते लेकिन सरोज हार न मानती।

इसी दौरान सरोज के दिल में सोहनलाल की जगह एक गु’रु से ज़्यादा होने लगी। वो उन्हें बेइंतहा चाहने लगीं आलम ये था कि ख़ुद सरोज ख़ा’न बताती हैं कि “मुझे अपने गु’रुजी से इतना प्यार था कि अगर मैं उन्हें किसी और डान्सर के साथ देख लेती तो जल भून जाती थी” आख़िर सरोज ने अपने दिल की बात सोहनलाल से कह ही दी। इस समय सरोज ख़ा’न केवल 13 सा’ल की थीं और सोहनलाल 43 सा’ल के। सोहनलाल ने सरोज ख़ा’न के गले में एक काला धागा बाँध दिया और सरोज ने मान लिया कि उनकी शादी हो गयी।

सब कुछ सपनों सा था कि सरोज को पता चला कि वो माँ बनने वाली हैं, 1963 में 14 सा’ल की उम्र में सरोज ने अपने बेटे राजू को जन्म दिया और उन्हें तब पता चला कि सोहनलाल न सिर्फ़ पहले से शादीशु’दा हैं बल्कि उनके चार बच्चे भी हैं। पहले तो सरोज को इस बात से ध’क्का लगा लेकिन फिर भी अपने प्यार को ब’ड़ा मानकर सरोज ने इस रिश्ते में ही आगे बढ़ने का फ़ै’सला किया। दो सा’ल बाद 1965 में सरोज ने एक बेटी को जन्म दिया जो सिर्फ़ आठ महीने में ही चल बसी। ये ही वक़्त था जब सरोज ख़ा’न ने सोहनलाल को छो’ड़ने का फ़ैसला किया क्योंकि उन्होंने सरोज के बच्चों को अपना नाम देने से मना कर दिया।

सरोज काम की तलाश में भटक रही थीं उन्हें काम मिलना शुरू ही हुआ कि सोहनलाल ने उन पर सिने डान्सर एसोशिएशन में शिकायत कर दी और सरोज को अपना काम छो’ड़कर सोहनलाल के असिसटेंट का काम फिर शुरू करना प’ड़ा। यही समय था जब सोहनलाल को दिल का दौरा प’ड़ा और सरोज एक बार फिर उनके क़’रीब आ गयीं। सरोज ख़ा’न एक बार फिर माँ बनीं उनकी बेटी कूक्कु का जन्म हुआ लेकिन अब सोहनलाल उनकी ज़िंदगी से चले गए और सरोज के ऊपर अकेले अपने बच्चों को पालने की ज़िम्मेदारी थी। ऐसे में सरोज का साथ साधना ने दिया और 1974 की फ़िल्म गीता मेरा नाम में उन्हें काम दिलाया। इसके बाद सरोज के पास काम आने लगे।

इसी बीच सरोज की ज़िंदगी में एक पठान बिसनेसमेन आए जो सरोज से शादी करना चाहते थे। वो ख़ुद पहले से शादीशुदा थे और उनके बच्चे भी थे लेकिन सरोज के प्यार में इस क़दर डूबे थे कि वो उसे अपना बनाना चाहते थे यही नहीं उन्होंने सरोज के बच्चों को अपना नाम देने की बात भी कही यही व बात थी जिसने सरोज का दिल जीत लिया और वो 1975 में सरदार रोशन ख़ा’न से शा’दी करके सरोज ख़ा’न बन गयी। सरोज ख़ा’न ने बताया कि वो बहुत ही अच्छे इंसान थे और सरोज उनकी पत्नी के साथ रहा करती थी। यही नहीं उनके जाने के बाद भी सरोज उनकी पत्नी के साथ रहा करती थी। सरोज ख़ा’न ने उसके बाद अपने काम से अपना नाम कमाया लेकिन वो न तो अपने गु’रु सोहनलाल को किसी तरह का कोई दोष देती हैं और न ही इस फ़िल्म इंडस्ट्री को।